
तुम्हारा है नहीं जो क्यों उसे अपना बताते होजो अपना हो नहीं सकता उसे अपना बनाते होये नश्वर देह नित्य है मगर देही है अनित्यभला क्यों भेद देह और देही का तुम भूल जाते होजहाँ से आये थे वापस वहीं पर लौट जाना हैयहीं रह जायेगा सब कुछ यहाँ जो भी कमाते होकोई परलोक की दौलत अभी तक जोड़ न पायेयहाँ की दौलतों को देख ना फूले समाते होकभी भी ध्यान-सिमरन में लगाया मन नहीं अपनाखलिश यम पाश को क्यों देख कर अब छटपटाते हो
No comments:
Post a Comment