Wednesday, August 19, 2009


गुजरे लम्हों को मैं अक्सर ढूँढती मिल जाऊँगी,जिस्म से भी मैं तुम्हे अक्सर जुदा मिल जाऊँगी.दूर कितनी भी रहूँ, खोलोगे जब भी आँख तुम,मैं सिरहाने पर तुम्हारे जागती मिल जाऊँगी.घर के बाहर जब कदम रखोगे अपना एक भी, बनके मैं तुमको तुम्हारा रास्ता मिल जाऊँगी.मुझपे मौसम कोई भी गुज़रे ज़रा भी डर नहीं,खुश्क टहनी पर भी तुमको मैं हरी मिल जाऊँगी.तुम ख्यालों में सही आवाज़ देके देखना,घर के बाहर मैं तुम्हें आती हुई मिल जाऊँगी.गर तसब्बुर भी मेरे इक शेर का तुमने किया,सुबह घर कि दीवारों पर लिखी हुई मिल जाऊँगी.

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