Friday, August 21, 2009


ये आंसुओ से तर हो सकते हैंरिश्ते और बेहतर हो सकते हैं
चंद सांसे अभी भी बाकी हैंमेरे नुख्से कारगर हो सकते हैं
हमें अब तक यकीं नहीं आयावो भी सितमगर हो सकते हैं
ये वक़्त का एक फलसफा हैफूल भी पत्थर हो सकते हैं
नुकसान की तो बात न करोये जनाब जानवर हो सकते हैं
दरख्त सूखने लगे अचानककई परिंदे बेघर हो सकते हैं
इस तरह मुलाक़ात की उसनेये चर्चे उम्र भर हो सकते हैं
अपने घर में कभी न सोचाहम भी बेक़दर हो सकते हैं
बात यकीं पे आके रुकती हैसायेबां सूखे शजर हो सकते हैं
कैफ़ियत यूँ ठीक नहीं अपनीतीर-ए-नज़र बेअसर हो सकते
हैं

5 comments:

  1. बहुत अच्छा लिखा है, भावुक है

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  2. बहुत सुन्दर !!!!!!!!!!1

    चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है.......भविष्य के लिये ढेर सारी शुभकामनायें.

    गुलमोहर का फूल

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  3. सुंदर रचना के साथ स्वागत है

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  4. "जनाब ये बात कुछ अच्छी नहीं लगी "

    खैर आलोक उपाध्याय "नज़र" की तरफ से ....

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